भूतों का तांडव – एक अनुभव (पार्ट-4)

हेल्लो दोस्तों आशा है आप सभी कुशल मंगल में होंगे…अपने इस अनुभव से मैंने आपको उन सभी घटनाओं का वृतांत प्रस्तुत करने की कोशिश की है… आशा है आप सभी का सहयोग जरूर मिलेगा. भूतों का तांडव – एक अनुभव एक अच्छी सीख साबित हो सकती है जो पैरानार्मल चीजों को बस हल्के में लेते हैं और बाद में पछताना पड़ता है.

भूतों का तांडव डिस्क्लेमर-

मैंने अपने इस अनुभव को कहानी का स्वरुप देने की कोशिश की है ताकि पाठक गण को पढने में आनंद और वो महसूस हो सके जो मैंने महसूस किया था. इस अनुभव में स्थान/जगह व सम्बंधित व्यक्तियों के नामों को सुरक्षा हित की दृष्टि से बदल दिया गया है. इसके साथ यह अनुभव कई पार्ट में प्रकाशित किया जायेगा.

इस अनुभव लेख में उल्लिखित की गई सभी सामग्री Copyrighted है. जिसका किसी अन्य के द्वारा commercial तौर पर इस्तेमाल किये जाने पर सख्त कार्यवाही की जाएगी. पिछले भाग में आपने “बक्कू ने कहा कि तू क्यों डरता है देख मेरे पास हनुमान चालीसा की किताब भी है… मजबूरी में फलाने बक्कू को ले जाने के लिए राजी हुआ…. इसके बाद दोनों लोग खेत की ओर निकल गए…” तक पढ़ा.. अब आगे-

उसी दिन दोपहर के करीबन 03 बजे गाँव में हल्ला हो गया कि फलाने के खेत पर 03 लोग बेहोश पड़े हैं… हम समझ गए कि जरूर फलाने और बक्कू ही होंगे लेकिन तीसरा व्यक्ति कौन हो सकता है…. हमने चाचा जी को बताया कि फलाने और बक्कू खेत पर ही गए थे…

चाचा जी ने झट से अपनी कुदाल और फावड़ा उठाया और खेत की ओर भागे… हम दोनों बड़ी असंजस में थे कि अब हम दोनों क्या करें… अन्नू बोला चल देखकर आते हैं… क्योंकि लगभग पूरा गाँव वहीं है तो हम लोग यहां क्या करेंगे…? मैंने भी कहा चलो ठीक है… हम दोनों भी खेत की ओर चल दिए….

जैसे ही गाँव के दक्षिण भाग में हम पहुचे मुझे और अन्नू को कुछ खुश-फुशाहट कान में सुनाई पड़ी… हमने एक-दूसरे को देखा… लेकिन न मैंने कुछ कहा और न ही अन्नू ने… जब हम खेत पर पहुचे तो देखा कि फलाने, बक्कू और फलाने के पापा तीनों लोग बेसुध पड़े हुए थे… चाचा, तीनो के चहरे पर पानी की फुहार डाल कर होश में लाने की कोशिश कर रहे थे…

थोड़ी देर बाद बक्कू को होश आता है… होश आते ही मैं बक्कू के सामने खड़ा था तो उसने सबसे पहले मुझे ही देखा और मुस्कुराकर एक दम से खड़ा हो गया… फिर जोर जोर से हंसाने लगा… उसकी हंसी जैसे किसी राक्षस की हंसी थी… जिसमें कर्कशता की वेदना थी… मैं समझ गया कि बक्कू किसी के वश में है….

मैंने अन्नू को इशारे में कहा कि चाचा को बताओ कि बक्कू ठीक नहीं है… अन्नू ने चाचा को बताया कि चाचा बक्कू किसी के वश में है…. चाचा और कुछ गाँव वालों ने फलाने, बक्कू और फलाने के पापा को उठाया और फिर हम लोग भुन्नी बाबा के यहाँ पहुचे…

यहाँ मैं बता दूं कि बाबा के आश्रम में बड़ी ही विचित्र बात थी, वहां एक सुकून था, एक अनोखी शक्ति का अहसास होता था… जैसे ही हम लोग वहां पहुचे तो आश्रम की चौखट पर फलाने और बक्कू बिलखने लगे… ऐसा महसूस हो रहा था कि दोनों उस स्थान से दूर भागना चाहते हैं… लेकिन शरीर पूरी तरह से साथ नहीं दे रहा….

कैसे भी करके तीनों को बाबा के पास लाया गया… जैसे ही बाबा ने तीनो को देखा और कहा तू फिर से आ गया… इस बार तुझ पर कोई रहम नहीं करूंगा… जवाब में फलाने कर्कश आवाज में बोला कि तू मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता… फिर बक्कू दहाड़ मारकर जोर-जोर से हंसने लगा….

बाबा ने अपनी दंड उठाया ही था कि दोनों शांति से उसी स्थान पर बैठ गए जहाँ पर खड़े थे… जो कुछ हो रहा था मैं उसे इतने ध्यान से देख और समझने की कोशिश कर रहा था लेकिन वहां की घटनाये मेरी समझ से बहार थीं…. एक-एक कर बाबा ने कई क्रियाएँ की और दोनों को ठीक किया… यह सब मामला लगभग 8 घंटों तक चला…..

जब तीनो को होश आया तो बाबा ने तीनो को एक सुरक्षा कवच दिया और कहा कि अगले दिन दोपहर के बाद फिर से आ जाना… इत्तेफाक की बात यह थी कि जो कुछ हमारे साथ हो रहा था… गाँव वालों को उसमें कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं दिख रही… इसका मतलब यह निकलता है… ऐसी घटनाएँ गाँव वालों के लिए सामान्य सी बात थी….

अब तक हम लोगों को गाँव में ठहरे हुए 06 दिन हो चुके थे और हम सभी अपनी जिंदगी के वो सबक सीख लिए थे जो शायद ही किसी को सीखने को मिलते हैं… असल में मनोविज्ञान के हिसाब से आंकलन किया जाये तो समाज में अधिकतर बार ऐसा जरूर देखा जाता है कि जो समस्या को हल कर समस्याओं पर विजय प्राप्त करने की क्षमता रखते हैं, समस्याएँ अधिकतर उन्ही के पास आती हैं….खैर….

अगले दिन शायद मंगलवार था… और उस दिन हमें वापस भी जाना था, लेकिन डर इस बात का था कि अगर हम लोग फलाने के गाँव से चले जाते हैं तो क्या हमें हमारी बाधाओं से निजात मिल जायेंगे या नहीं…? यह एक ऐसा प्रश्न था जो मुझे मन ही मन कचोडता जा रहा था….

एकाएक मुझे विचार आया कि क्यों न मैं अपने प्रश्न का जवाब बाबा से पूँछ लूं…. मैंने सभी दोस्तों के साथ चाचा को लिया और बाबा के पास गया… बाबा मुझे देखते ही मुस्कुराने लगे… न जाने कैसा था आकर्षण उनकी मुस्कान में… मुस्कुराते हुए उन्होंने कहा कि तुम जिसका जवाब लेने आये हो… उसका समाधान ये (ताबीज दिखाते हुए) है और इसे तुम सभी को अपने हाथ या गले में धारण करना है….

उनके वचन सुनकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि उन्हें कैसे पता मैं क्या पूंछने वाला हूँ…. थोड़ी देर बाद बाबा मुझसे बोले तुम्हारी पात्रता बढ़ रही है… यदि ईश्वर की विशेष कृपा पाना चाहते हो तो आने वाले भविष्य में अपनी संगती को ठीक रखना… विशेषकर चरित्र से… मैंने हां में सर हिला दिया….

बीते कई सालों में फलाने ने भी अपना घर गाँव छोड़कर शहर में बना लिया… और अन्नू, बक्कू और मैंने M.Sc. की डिग्री हांसिल की और हम सभी अपने जीवन में काफी अच्छी स्थिति में हैं… फलाने भी शहर में जॉब करता है…. और अपने चाचा चाची के साथ रहता है…. लेकिन अभी उसने शादी नहीं की है….

आज इस बात को कई साल बीत गए हैं….. लेकिन जब भी हम उस समय को याद करते हैं… हम सभी के शरीर में एक सिहरन सी दौड़ जाती है….. फलाने ने बताया कि हम लोगों के जाने के लगभग 03 साल बाद भुन्नी बाबा हिमालय की ओर चले गए थे… जो अभी तक लौटे नहीं….

तो ये था एक अनुभव जिसको मैंने आपके सामने रखा है…. इस अनुभव के बाद मेरा पूरा दृष्टिकोण ही बदल गया…… जब किसी को भी इस तरह के अनुभव होते हैं…. तो इससे निपटने के लिए मनोविज्ञान और मनोस्थिति सबसे कारगर रणनीति है…. साथ ही किताबें सहायक साबित होती हैं….

आशा है आपको मेरे इस भूतों का तांडव – एक अनुभव से कुछ न कुछ सीखने को जरूर मिला होगा… अगर आप यहाँ तक पढ़ चुके हैं…. तो आपको मेरा तहे दिल से धन्यवाद है…… साथ ही यदि सुझाव या कहना चाहते हैं तो कृपया comment box में लिखें…

धन्यवाद!

जय हिंद! जय भारत!

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें